Saturday, July 23, 2011

भारत का मस्तक


एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते

पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा

अगणित बलिदानों से अर्जित यह स्वतंत्रता

सुशोभित शोणित से सींचित यह स्वतंत्रता

त्याग तेज तप बल से रक्षित यह स्वतंत्रता

दुखी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतंत्रता

इसे मिटाने कि साजिश करने वालों से कह दो

चिंगारी का खेल बुरा होता है

औरों के घर आग लगाने का जो सपना

वह अपने हीं घर में सदा खराब होता है

अपने हीं हाथों तुम अपनी कब्र न खोदो

अपने पैरों आप कुल्हारी नहीं चलाओ

ओ नादान पड़ोसी अपनी आँखें खोलो

आजादी अनमोल, न इसका मोल लगाओ

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है!

तुम्हें मुफ्त में मिली, न कीमत गयी चुकाई

अंग्रेजों के बल पर दो टुकड़े पाए हैं

माँ को खंडित करते तुमको लाज न आयी

अमरीकी शस्त्रों से
अपनी आज़ादी को
दुनिया में कायम रख लोगो यह मत समझो

दस - बीस अरब डॉलर लेकर
आने वाली बर्बादी से
तुम बच लोगे ये मत समझो

धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से

कश्मीर कभी अपना लोगे यह मत समझो

हमलों से अत्याचारों से संहारों से

भारत का शीश झुका लोगे यह मत समझो

जब तक गंगा की धार, सिंधु में ज्वार

अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष

स्वातंत्र समर की बेदी पर अर्पित होंगे

अगणित जीवन जौवन अशेष

अमरीका क्या संसार भले हीं हो विरुद्ध

काश्मीर पर भारत का ध्वज नहीं झुकेगा

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते

पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा
           
अटल बिहारी वाजपयी

Friday, July 22, 2011

अछूत मानसिकता . . .

दलित शब्द किसने बनाया है? . . . कब से है यह समूह? . . . अछूत शब्द किस वेद/ पुराण/ उपनिषद/ पुष्तक में लिखा है? हह! वेद में क्या लिखा है? वेद का उपयोग क्या है? इसकी सीमा क्या है? कभी देखा है वेद को? हह!
जागे हैं! बधाई हो! अंगराई ले लीजिए . . . होश में आने का इन्तेज़ार रहेगा . . . और जब पूरी तरह बाहर आ जाईये तो हीं लोगों को बुलाईय, नहीं तो यत्र तत्र बिखरे कपड़ों में आपको पता नहीं कैसा लगता होगा हमें आपको वैसा देखना अच्छा नहीं लगता . . . कभी कभी इंसान जगने के तुरत बाद नंगा होता है . . .


तो फिर जागो, उठो और काम
करो . . . क्या करना है नहीं समझ में आता है तो आसपास देखो . . . जग गए हो तो देख सकते हो यार . . . नहीं देख सकते हो मतलब अभी और जगना है . . .


और बात संघर्ष की, किसे नहीं करना परता है? कुछ भी अच्छा करने के लिये, जहां से शुरू कर जहाँ जाना होता है उसके “हिसाब” से सबको करना परता है, चाहे वो किसी भी कुल में पैदा हुआ हो. इस नियम को समझ जाईये तभी शांति से आगे बढ़ सकते हैं जिंदगी में . . . नहीं तो यूं हीं सड़क/ नदी किनारे बैठ कर रोते/ शिकायत करते रहेंगे . . . हाँ कभी कभी किस्मत से किसी को कुछ मिल जाता है, लेकिन वह नियम नहीं होता है . . . लेकिन एक नियम जरुर है, समाज के निचले स्तर से हीं हमेशा समाज को बदलने वाला पैदा हुआ है . . . हिमालय के दक्षिण में पैदा हुए सभी के सभी महानायक बिना शको सुबहा के इस नियम के उदाहरण हैं . . .
इस नियम का पूरे संसार में एक मात्र अपवाद महात्मा बुद्ध थे! और कोई मिल जाए तो जरुर बतलाना . . .

Tuesday, July 5, 2011

डॉ. अजय कुमार: नया जार्ज फर्नांडीस या शंकराचार्य या महात्मा गांधी!

झारखंड विकास मोर्चा के डॉ. अजय कुमार जमशेदपुर संसदीय सीट से 1,55,000 मतों से आरामदायक मार्जिन से जीते. डॉ. अजय कुमार न तो आदिवासी, न ही झारखंडी और न ही बिहारी या उत्तर भारतीय हैं. वह कर्नाटक से हैं.
जमशेदपुर का विभिन्न राज्यों से लोगों की बड़ी आबादी के कारण एक महानगरीय नजरिया है. फिर भी शहर मूल रूप से बिहारियों का प्रभुत्व है और वे जनजाति सहित किसी भी अन्य समूह से राजनैतिक रूप से अधिक प्रभावी हैं. दरअसल झारखंड और कुछ नहीं बल्कि बिहार का ही विस्तार है.

डॉ. कुमार, इस चुनाव में जहां हर पार्टी उम्मीदवार भर दिया था, अपने ही अच्छी प्रतिष्ठा की वजह से जीते. एक आईपीएस अधिकारी के रूप में वह अच्छा काम किये हैं. उन्होंने पटना के एसपी के रूप में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद स्थल पर राम मंदिर की नींव रखने के बाद 1990 में दंगा भड़का बहुत अच्छा काम किया था. उनकी सांप्रदायिक दंगे से सख्ती से निपटने के लिए व्यापक रूप से सराहना की गई. इस कारण बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री और राजद नेता लालू यादव उन्हें बहुत पसंद करते थे. बाद में वह पूर्वी सिंहभूम जिले जमशेदपुर के एसपी बन गया. लेकिन अंततः 1996 में उन्हीं राजनीतिक आकाओं के साथ मतभेद के कारण उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दिया.

डा. अजय कुमार की यह जीत उनकी ईमानदारी, बहादुरी और सादगी के कारण है. लेकिन  साथ हीं यह बिहारियों के खुलापन और उदारता का एक और उदाहरण है. देश के विभिन्न भागों में बिहारियों पर हाल के हमलों के बावजूद, बिहारि अभी भी नए विचारों और नए लोगों स्थान देने के लिए तैयार रहते हैं चाहे वो कोई भी हो कहीं से हो.

डॉ. कुमार की यह जीत मुझे कुछ ऐतिहासिक लोगों की खास कर दक्षिणी राज्यों के लोगों की याद दिलाता है जिसमें शंकराचार्य और जॉर्ज फर्नांडीस शामिल हैं जो बिहार से प्रसिद्धि के शिखर तक पंहुचे. इसके अलावा, हमें महात्मा गांधी के बनाने में चंपारण की भूमिका को नहीं भूलना चाहिए. और हाँ, यहाँ तक कि चाणक्य पंजाब और बिहार से नहीं था, लेकिन बिहार आकर उसने इतिहास को बदल दिया!

हिन्दी गढ़ जो जिसकी बिहार हमेशा धुरी रही है, दुनिया के अन्य भागों से लोगों द्वारा एक उपजाऊ भूमि के रूप में इस्तेमाल किया गया है, किया जा रहा है. पर संसार का यह इलाका सदियों से अपनी मुसीबतों से बाहर में सक्षम नहीं है. यहां तक ​​कि नेहरू परिवार, जो अभी भी भारतीय राजनीति की जड़ों पर राज कर रही है मूल रूप से कश्मीर से है और केवल हिंदी क्षेत्र से लोगों के समर्थन के कारण रही है या यूं कहें कि केवल हिंदी क्षेत्र के लोगों के समर्थन तक आराम से देश पर राज कर पाई है.
लेकिन आज तक कोई भी हिंदी क्षेत्र की स्थिति में सुधार लाने की परवाह नहीं किया!

क्यों?

मुझे लगता है कि हिंदी क्षेत्र तब तक रोशनी नहीं देख पायेगा जब तक यहाँ कि धरती से कोई नेता/ मसीहा पैदा नहीं होता. लेकिन ऐसा सदियों से नहीं हुआ है. हमारे नेता केवल दूसरों के लिये काम करके खुश रहे हैं! भगवान बुद्ध और महावीर के बाद, वहाँ / बिहार या पड़ोसी हिंदी पट्टी के राज्यों में कोई सामाजिक मंथन नहीं किया गया है. पड़ोसी बंगाल के इलाके में रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, राम मोहन राय, रवींद्र नाथ टैगोर और विद्यासागर जैसे लोग हाल की सदियों में हुए. लेकिन हिंदी पट्टी से कोई नहीं! शायद अभी तक सीता द्वारा दिए अभिशाप कि यह धरती कभी अपने बेटे के लिये खड़ी नहीं हो सकती, से मुक्ति नहीं मिली है, या भगवान बुद्ध द्वारा पूर्वानुमान कि अंतर्कलह  हमेशा यहाँ कि समस्या रहेगी, अभी भी प्रभावी है!
भगवान हमें एक भगवान बुद्ध, एक मौर्या से नवाज़े.