Saturday, October 29, 2011

छठ


छठ और दिवाली भारतीय संस्कृति के सबसे पुराने त्यौहार में से है. छठ क्यूँ बिहार/ पूर्वी उत्तर प्रदेश में सिमट कर रह गया यह आज कि तारीख में सिर्फ अंदाज लगाया जा सकता है – मेरी अमझ से इसका कारण सदियों से हमारे देश की असुरक्षा हो – क्यूंकि इस पूजा का बड़ा हिस्सा घर से बाहर – जल श्रोत के किनारे होना होता है.

छठ इस संसार और जिंदगी के छः सबसे महत्वपूर्ण तत्वों – आग, जल, मिट्टी, वायु, अन्न तथा सूर्य कि अराधना है. कोई आश्चर्य नहीं यदि प्राचीन काल में यह पर्व दिवाली के अग्नि पूजा से शुरू होकर छठे दिन सूर्य पूजा पर समाप्त होती रही हो!

जो भी हो, छठ, जीवन के सबसे महत्वपूर्ण कारकों की अराधना का पर्व है. मैं अपनी ओर से सूर्य देव की शान शान में सर झुकाता हूँ और जगत कल्याण की कामना करता हूँ.

Tuesday, October 25, 2011

अभासिय संसार में नैतिकता


इस लेख के साथ मैंने जो चित्र डाला है वह मेरे एक फेसबुक मित्र तथा पत्रकार श्री रंजित कुमार जी द्वारा रांची से प्रकाशित एक पत्रिका के लिये लिखी गयी है. आप देख सकते हैं कि उन्होंने अपने आलेख का प्रारम्भ हीं मेरे नाम के उल्लेख से किया है. यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी दो बार उन्होंने फेसबुक से मेरी पंक्तियों को जगह दिया है. मेरे एक और मित्र हैं नवीन कुमार जी – उन्होंने भी कुछ ऐसा हीं किया है. लेकिन हर बार ऐसा अच्छा अनुभव नहीं होता है. एक बार एक श्रीमान मेरे प्रोफाइल से चोरी कर कुछ पंक्तियाँ एक ग्रुप पर पोस्ट किये (उस ग्रुप में वो “प्रशासक” थे!) और मेरी पत्नी द्वारा पकडे जाने पर न केवल उन्होंने उसका बड़ा अभद्र और लापरवाही भडा जवाब दिया बल्कि मेरी पत्नी द्वारा उनकी “तारीफ” में लिखे पोस्ट को हटा भी दिया (ग्रुप में “प्रशासक” जो थे); तुर्रा ये कि वो महानुभाव “पेशे” से “कहने सुनने” से जुड़े हैं! तो कुछ अपना कहो यार! दूसरों की नक़ल मारो तो मर्यादा के साथ, तरीके से, चोरी से नहीं. आने वाले दिनों में यह समस्या सुरसा की तरह बड़ी होती चली जायेगी और ऐसे में कम से कम मेरी जिंदगी में श्री रंजित कुमार जी और श्री नवीन कुमार जी ऊंचे मानदंडों के साथ मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे.

मेरा भगवान


मेरा भगवान

इन्ही पत्थरों में कहीं

छुपा है मेरा भगवान

मुझे मालूम है

वो न देखता है मेरी तरह

न बोलता है मेरी तरह

न सुनता है मेरी तरह

न दिखता है मेरी तरह

फिर मुझे यकीन है

इसी में कहीं बसता है वह

मेरी तरह

मुझे यकीन है

यहीं कहीं से

या, ऐसे हीं कहीं से

या, कहीं से

मुझे देखता है वह

क्यूंकि, वक्त – बेवक्त

अपने होने का अहसास दिलाता है वह

मेरे विज्ञान

या, वैज्ञानिक मित्रों की समझ से,

मेरी यह सोच,

यह विश्वास

यह धारणा

एक बीमारी, एक बेहोशी हो सकती है

पर, मुझे यकीन है

वह यहीं बसता है

क्यूंकि उसके इन अनेक रूपों में

जब मैं खो जाता हूँ

तो, सचमुच में मुझे दिखता है वह

और मुझे देखता है वही

सुनता है वह

और, कहता है वह

कि, हर जगह रहता है वह

इसीलिये मैं कहता हूँ

कि इन्हीं किन्हीं पत्थर के टुकड़ों में

बसता है वह!

जब किसी और को इन पत्थरों में भगवान नहीं दिखता

तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता

मुझे अपने परिश्रम का अहसास होता है

क्यूंकि मुझे भी वह आसानी से नहीं दिखा है

जब मैंने अपने विचारों कि सारी गुत्थियां सुलझाकर

जीवन के सारे मार्ग को अन्धेरा

और बंद पाकर

अपने को उसके चरणों में समर्पित कर

अपने शरीर के एक - एक कण को

एक – एक आँख बना देखा

तो वह मेरी हर आँख में बैठा दिखा

जब अपने शरीर के एक – एक कण को

कान बना कर सुना

तो हर ध्वनी उसी कि लगी

और, वह ध्वनी हर ओर से आ रही थी

इसीलिये दृढता से कहता हूँ

कि इन पत्थरों में भी कहीं रहता है वह

कभी छुपता है वह

कभी दिखता है वह

कभी बोलता है वह

कभी सुनता है वह

और इसी तरह

अपने होने

न - होने का

भ्रम पैदा करता है वह

इसी भ्रम में हीं कहीं रहता है वह

उसके बनाए भ्रम में जब मैं खो जाता हूँ

तभी मुझे दिखता है वह

इस संसार में जब मैं खो जाता हूँ

तभी मुझे दिखता है वह

तब जरूर दिखता है वह

कभी ध्रुव तारा सा

तो कभी चाँद, कभी सूरज सा दिखता है वह

इसीलिये मैं कहता हूँ

यहीं कहीं रहता है वह

मुझे पूरा यकीन है

इन्हीं पत्थरों में कहीं रहता है वह!

इन पत्थरों में तो मेरा भगवान जरूर बसता है

क्यूंकि इन पत्थरों को मैंने अपने हाथों से सजाया है

संजोया है, संवारा है

इन पत्थरों को भगवान बनाया है

इसीलिये इसमें मेरा भगवान रहता है

जरुर रहता है

किसिस और का न सही

सिर्फ मेरा हीं भगवान रहता है

अकेले रहता है

वो मेरी सुनता भी है

और मुझे आवाज़ भी देता है

कभी देखता है, कभी दिखता भी है

वह मुझे दिखता है – इसमें संदेह हो सकता है

लेकिन वो मुझे देखता है – इसमें कोई संदेह नहीं

वह सुनाई देता है - इसमें संदेह हो सकता है

लेकिन वो मेरी सुनता है – इसमें कोई संदेह नहीं

मेरी सुनने और मुझे देखने का प्रमाण वह वक्त – बेवक्त देता रहता है

इसी लिये मैं कहता हूँ, इन्हीं किन्हीं पत्थरों में वह है

मेरा भगवान!
तुझे मानना है तो मान
नहीं तो तेरी मर्जी है नादान
हज़ारों सालों से आये समझाने वाले
सदियों से ढूंढ रहे हैं विज्ञान वाले
भगवान को पत्थर कहता है बदजुबान!
मैं कहता हूँ, इसी में है मेरा भगवान!