Tuesday, October 25, 2011

अभासिय संसार में नैतिकता


इस लेख के साथ मैंने जो चित्र डाला है वह मेरे एक फेसबुक मित्र तथा पत्रकार श्री रंजित कुमार जी द्वारा रांची से प्रकाशित एक पत्रिका के लिये लिखी गयी है. आप देख सकते हैं कि उन्होंने अपने आलेख का प्रारम्भ हीं मेरे नाम के उल्लेख से किया है. यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी दो बार उन्होंने फेसबुक से मेरी पंक्तियों को जगह दिया है. मेरे एक और मित्र हैं नवीन कुमार जी – उन्होंने भी कुछ ऐसा हीं किया है. लेकिन हर बार ऐसा अच्छा अनुभव नहीं होता है. एक बार एक श्रीमान मेरे प्रोफाइल से चोरी कर कुछ पंक्तियाँ एक ग्रुप पर पोस्ट किये (उस ग्रुप में वो “प्रशासक” थे!) और मेरी पत्नी द्वारा पकडे जाने पर न केवल उन्होंने उसका बड़ा अभद्र और लापरवाही भडा जवाब दिया बल्कि मेरी पत्नी द्वारा उनकी “तारीफ” में लिखे पोस्ट को हटा भी दिया (ग्रुप में “प्रशासक” जो थे); तुर्रा ये कि वो महानुभाव “पेशे” से “कहने सुनने” से जुड़े हैं! तो कुछ अपना कहो यार! दूसरों की नक़ल मारो तो मर्यादा के साथ, तरीके से, चोरी से नहीं. आने वाले दिनों में यह समस्या सुरसा की तरह बड़ी होती चली जायेगी और ऐसे में कम से कम मेरी जिंदगी में श्री रंजित कुमार जी और श्री नवीन कुमार जी ऊंचे मानदंडों के साथ मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे.

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