इस लेख के साथ मैंने जो चित्र डाला है वह मेरे एक फेसबुक मित्र तथा पत्रकार श्री रंजित कुमार जी द्वारा रांची से प्रकाशित एक पत्रिका के लिये लिखी गयी है. आप देख सकते हैं कि उन्होंने अपने आलेख का प्रारम्भ हीं मेरे नाम के उल्लेख से किया है. यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी दो बार उन्होंने फेसबुक से मेरी पंक्तियों को जगह दिया है. मेरे एक और मित्र हैं नवीन कुमार जी – उन्होंने भी कुछ ऐसा हीं किया है. लेकिन हर बार ऐसा अच्छा अनुभव नहीं होता है. एक बार एक श्रीमान मेरे प्रोफाइल से चोरी कर कुछ पंक्तियाँ एक ग्रुप पर पोस्ट किये (उस ग्रुप में वो “प्रशासक” थे!) और मेरी पत्नी द्वारा पकडे जाने पर न केवल उन्होंने उसका बड़ा अभद्र और लापरवाही भडा जवाब दिया बल्कि मेरी पत्नी द्वारा उनकी “तारीफ” में लिखे पोस्ट को हटा भी दिया (ग्रुप में “प्रशासक” जो थे); तुर्रा ये कि वो महानुभाव “पेशे” से “कहने सुनने” से जुड़े हैं! तो कुछ अपना कहो यार! दूसरों की नक़ल मारो तो मर्यादा के साथ, तरीके से, चोरी से नहीं. आने वाले दिनों में यह समस्या सुरसा की तरह बड़ी होती चली जायेगी और ऐसे में कम से कम मेरी जिंदगी में श्री रंजित कुमार जी और श्री नवीन कुमार जी ऊंचे मानदंडों के साथ मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे.
Tuesday, October 25, 2011
मेरा भगवान
मेरा भगवान
इन्ही पत्थरों में कहीं
छुपा है मेरा भगवान
मुझे मालूम है
वो न देखता है मेरी तरह
न बोलता है मेरी तरह
न सुनता है मेरी तरह
न दिखता है मेरी तरह
फिर मुझे यकीन है
इसी में कहीं बसता है वह
मेरी तरह
मुझे यकीन है
यहीं कहीं से
या, ऐसे हीं कहीं से
या, कहीं से
मुझे देखता है वह
क्यूंकि, वक्त – बेवक्त
अपने होने का अहसास दिलाता है वह
मेरे विज्ञान
या, वैज्ञानिक मित्रों की समझ से,
मेरी यह सोच,
यह विश्वास
यह धारणा
एक बीमारी, एक बेहोशी हो सकती है
पर, मुझे यकीन है
वह यहीं बसता है
क्यूंकि उसके इन अनेक रूपों में
जब मैं खो जाता हूँ
तो, सचमुच में मुझे दिखता है वह
और मुझे देखता है वही
सुनता है वह
और, कहता है वह
कि, हर जगह रहता है वह
इसीलिये मैं कहता हूँ
कि इन्हीं किन्हीं पत्थर के टुकड़ों में
बसता है वह!
जब किसी और को इन पत्थरों में भगवान नहीं दिखता
तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता
मुझे अपने परिश्रम का अहसास होता है
क्यूंकि मुझे भी वह आसानी से नहीं दिखा है
जब मैंने अपने विचारों कि सारी गुत्थियां सुलझाकर
जीवन के सारे मार्ग को अन्धेरा
और बंद पाकर
अपने को उसके चरणों में समर्पित कर
अपने शरीर के एक - एक कण को
एक – एक आँख बना देखा
तो वह मेरी हर आँख में बैठा दिखा
जब अपने शरीर के एक – एक कण को
कान बना कर सुना
तो हर ध्वनी उसी कि लगी
और, वह ध्वनी हर ओर से आ रही थी
इसीलिये दृढता से कहता हूँ
कि इन पत्थरों में भी कहीं रहता है वह
कभी छुपता है वह
कभी दिखता है वह
कभी बोलता है वह
कभी सुनता है वह
और इसी तरह
अपने होने
न - होने का
भ्रम पैदा करता है वह
इसी भ्रम में हीं कहीं रहता है वह
उसके बनाए भ्रम में जब मैं खो जाता हूँ
तभी मुझे दिखता है वह
इस संसार में जब मैं खो जाता हूँ
तभी मुझे दिखता है वह
तब जरूर दिखता है वह
कभी ध्रुव तारा सा
तो कभी चाँद, कभी सूरज सा दिखता है वह
इसीलिये मैं कहता हूँ
यहीं कहीं रहता है वह
मुझे पूरा यकीन है
इन्हीं पत्थरों में कहीं रहता है वह!
इन पत्थरों में तो मेरा भगवान जरूर बसता है
क्यूंकि इन पत्थरों को मैंने अपने हाथों से सजाया है
संजोया है, संवारा है
इन पत्थरों को भगवान बनाया है
इसीलिये इसमें मेरा भगवान रहता है
जरुर रहता है
किसिस और का न सही
सिर्फ मेरा हीं भगवान रहता है
अकेले रहता है
वो मेरी सुनता भी है
और मुझे आवाज़ भी देता है
कभी देखता है, कभी दिखता भी है
वह मुझे दिखता है – इसमें संदेह हो सकता है
लेकिन वो मुझे देखता है – इसमें कोई संदेह नहीं
वह सुनाई देता है - इसमें संदेह हो सकता है
लेकिन वो मेरी सुनता है – इसमें कोई संदेह नहीं
मेरी सुनने और मुझे देखने का प्रमाण वह वक्त – बेवक्त देता रहता है
इसी लिये मैं कहता हूँ, इन्हीं किन्हीं पत्थरों में वह है
मेरा भगवान!
तुझे मानना है तो मान
नहीं तो तेरी मर्जी है नादान
हज़ारों सालों से आये समझाने वाले
सदियों से ढूंढ रहे हैं विज्ञान वाले
भगवान को पत्थर कहता है बदजुबान!
मैं कहता हूँ, इसी में है मेरा भगवान!
Saturday, July 23, 2011
भारत का मस्तक
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते
पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा
अगणित बलिदानों से अर्जित यह स्वतंत्रता
सुशोभित शोणित से सींचित यह स्वतंत्रता
त्याग तेज तप बल से रक्षित यह स्वतंत्रता
दुखी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतंत्रता
इसे मिटाने कि साजिश करने वालों से कह दो
चिंगारी का खेल बुरा होता है
औरों के घर आग लगाने का जो सपना
वह अपने हीं घर में सदा खराब होता है
अपने हीं हाथों तुम अपनी कब्र न खोदो
अपने पैरों आप कुल्हारी नहीं चलाओ
ओ नादान पड़ोसी अपनी आँखें खोलो
आजादी अनमोल, न इसका मोल लगाओ
पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है!
तुम्हें मुफ्त में मिली, न कीमत गयी चुकाई
अंग्रेजों के बल पर दो टुकड़े पाए हैं
माँ को खंडित करते तुमको लाज न आयी
अमरीकी शस्त्रों से
अपनी आज़ादी को
दुनिया में कायम रख लोगो यह मत समझो
दस - बीस अरब डॉलर लेकर
आने वाली बर्बादी से
तुम बच लोगे ये मत समझो
धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से
कश्मीर कभी अपना लोगे यह मत समझो
हमलों से अत्याचारों से संहारों से
भारत का शीश झुका लोगे यह मत समझो
जब तक गंगा की धार, सिंधु में ज्वार
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष
स्वातंत्र समर की बेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन जौवन अशेष
अमरीका क्या संसार भले हीं हो विरुद्ध
काश्मीर पर भारत का ध्वज नहीं झुकेगा
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते
पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा
अटल बिहारी वाजपयी
Friday, July 22, 2011
अछूत मानसिकता . . .
दलित शब्द किसने बनाया है? . . . कब से है यह समूह? . . . अछूत शब्द किस वेद/ पुराण/ उपनिषद/ पुष्तक में लिखा है? हह! वेद में क्या लिखा है? वेद का उपयोग क्या है? इसकी सीमा क्या है? कभी देखा है वेद को? हह!
जागे हैं! बधाई हो! अंगराई ले लीजिए . . . होश में आने का इन्तेज़ार रहेगा . . . और जब पूरी तरह बाहर आ जाईये तो हीं लोगों को बुलाईय, नहीं तो यत्र तत्र बिखरे कपड़ों में आपको पता नहीं कैसा लगता होगा हमें आपको वैसा देखना अच्छा नहीं लगता . . . कभी कभी इंसान जगने के तुरत बाद नंगा होता है . . .
तो फिर जागो, उठो और काम
करो . . . क्या करना है नहीं समझ में आता है तो आसपास देखो . . . जग गए हो तो देख सकते हो यार . . . नहीं देख सकते हो मतलब अभी और जगना है . . .
और बात संघर्ष की, किसे नहीं करना परता है? कुछ भी अच्छा करने के लिये, जहां से शुरू कर जहाँ जाना होता है उसके “हिसाब” से सबको करना परता है, चाहे वो किसी भी कुल में पैदा हुआ हो. इस नियम को समझ जाईये तभी शांति से आगे बढ़ सकते हैं जिंदगी में . . . नहीं तो यूं हीं सड़क/ नदी किनारे बैठ कर रोते/ शिकायत करते रहेंगे . . . हाँ कभी कभी किस्मत से किसी को कुछ मिल जाता है, लेकिन वह नियम नहीं होता है . . . लेकिन एक नियम जरुर है, समाज के निचले स्तर से हीं हमेशा समाज को बदलने वाला पैदा हुआ है . . . हिमालय के दक्षिण में पैदा हुए सभी के सभी महानायक बिना शको सुबहा के इस नियम के उदाहरण हैं . . .
इस नियम का पूरे संसार में एक मात्र अपवाद महात्मा बुद्ध थे! और कोई मिल जाए तो जरुर बतलाना . . .
जागे हैं! बधाई हो! अंगराई ले लीजिए . . . होश में आने का इन्तेज़ार रहेगा . . . और जब पूरी तरह बाहर आ जाईये तो हीं लोगों को बुलाईय, नहीं तो यत्र तत्र बिखरे कपड़ों में आपको पता नहीं कैसा लगता होगा हमें आपको वैसा देखना अच्छा नहीं लगता . . . कभी कभी इंसान जगने के तुरत बाद नंगा होता है . . .
तो फिर जागो, उठो और काम
करो . . . क्या करना है नहीं समझ में आता है तो आसपास देखो . . . जग गए हो तो देख सकते हो यार . . . नहीं देख सकते हो मतलब अभी और जगना है . . .
और बात संघर्ष की, किसे नहीं करना परता है? कुछ भी अच्छा करने के लिये, जहां से शुरू कर जहाँ जाना होता है उसके “हिसाब” से सबको करना परता है, चाहे वो किसी भी कुल में पैदा हुआ हो. इस नियम को समझ जाईये तभी शांति से आगे बढ़ सकते हैं जिंदगी में . . . नहीं तो यूं हीं सड़क/ नदी किनारे बैठ कर रोते/ शिकायत करते रहेंगे . . . हाँ कभी कभी किस्मत से किसी को कुछ मिल जाता है, लेकिन वह नियम नहीं होता है . . . लेकिन एक नियम जरुर है, समाज के निचले स्तर से हीं हमेशा समाज को बदलने वाला पैदा हुआ है . . . हिमालय के दक्षिण में पैदा हुए सभी के सभी महानायक बिना शको सुबहा के इस नियम के उदाहरण हैं . . .
इस नियम का पूरे संसार में एक मात्र अपवाद महात्मा बुद्ध थे! और कोई मिल जाए तो जरुर बतलाना . . .
Tuesday, July 5, 2011
डॉ. अजय कुमार: नया जार्ज फर्नांडीस या शंकराचार्य या महात्मा गांधी!
झारखंड विकास मोर्चा के डॉ. अजय कुमार जमशेदपुर संसदीय सीट से 1,55,000 मतों से आरामदायक मार्जिन से जीते. डॉ. अजय कुमार न तो आदिवासी, न ही झारखंडी और न ही बिहारी या उत्तर भारतीय हैं. वह कर्नाटक से हैं.
जमशेदपुर का विभिन्न राज्यों से लोगों की बड़ी आबादी के कारण एक महानगरीय नजरिया है. फिर भी शहर मूल रूप से बिहारियों का प्रभुत्व है और वे जनजाति सहित किसी भी अन्य समूह से राजनैतिक रूप से अधिक प्रभावी हैं. दरअसल झारखंड और कुछ नहीं बल्कि बिहार का ही विस्तार है.
डॉ. कुमार, इस चुनाव में जहां हर पार्टी उम्मीदवार भर दिया था, अपने ही अच्छी प्रतिष्ठा की वजह से जीते. एक आईपीएस अधिकारी के रूप में वह अच्छा काम किये हैं. उन्होंने पटना के एसपी के रूप में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद स्थल पर राम मंदिर की नींव रखने के बाद 1990 में दंगा भड़का बहुत अच्छा काम किया था. उनकी सांप्रदायिक दंगे से सख्ती से निपटने के लिए व्यापक रूप से सराहना की गई. इस कारण बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री और राजद नेता लालू यादव उन्हें बहुत पसंद करते थे. बाद में वह पूर्वी सिंहभूम जिले जमशेदपुर के एसपी बन गया. लेकिन अंततः 1996 में उन्हीं राजनीतिक आकाओं के साथ मतभेद के कारण उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दिया.
डा. अजय कुमार की यह जीत उनकी ईमानदारी, बहादुरी और सादगी के कारण है. लेकिन साथ हीं यह बिहारियों के खुलापन और उदारता का एक और उदाहरण है. देश के विभिन्न भागों में बिहारियों पर हाल के हमलों के बावजूद, बिहारि अभी भी नए विचारों और नए लोगों स्थान देने के लिए तैयार रहते हैं चाहे वो कोई भी हो कहीं से हो.
डॉ. कुमार की यह जीत मुझे कुछ ऐतिहासिक लोगों की खास कर दक्षिणी राज्यों के लोगों की याद दिलाता है जिसमें शंकराचार्य और जॉर्ज फर्नांडीस शामिल हैं जो बिहार से प्रसिद्धि के शिखर तक पंहुचे. इसके अलावा, हमें महात्मा गांधी के बनाने में चंपारण की भूमिका को नहीं भूलना चाहिए. और हाँ, यहाँ तक कि चाणक्य पंजाब और बिहार से नहीं था, लेकिन बिहार आकर उसने इतिहास को बदल दिया!
हिन्दी गढ़ जो जिसकी बिहार हमेशा धुरी रही है, दुनिया के अन्य भागों से लोगों द्वारा एक उपजाऊ भूमि के रूप में इस्तेमाल किया गया है, किया जा रहा है. पर संसार का यह इलाका सदियों से अपनी मुसीबतों से बाहर में सक्षम नहीं है. यहां तक कि नेहरू परिवार, जो अभी भी भारतीय राजनीति की जड़ों पर राज कर रही है मूल रूप से कश्मीर से है और केवल हिंदी क्षेत्र से लोगों के समर्थन के कारण रही है या यूं कहें कि केवल हिंदी क्षेत्र के लोगों के समर्थन तक आराम से देश पर राज कर पाई है.
लेकिन आज तक कोई भी हिंदी क्षेत्र की स्थिति में सुधार लाने की परवाह नहीं किया!
लेकिन आज तक कोई भी हिंदी क्षेत्र की स्थिति में सुधार लाने की परवाह नहीं किया!
क्यों?
मुझे लगता है कि हिंदी क्षेत्र तब तक रोशनी नहीं देख पायेगा जब तक यहाँ कि धरती से कोई नेता/ मसीहा पैदा नहीं होता. लेकिन ऐसा सदियों से नहीं हुआ है. हमारे नेता केवल दूसरों के लिये काम करके खुश रहे हैं! भगवान बुद्ध और महावीर के बाद, वहाँ / बिहार या पड़ोसी हिंदी पट्टी के राज्यों में कोई सामाजिक मंथन नहीं किया गया है. पड़ोसी बंगाल के इलाके में रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, राम मोहन राय, रवींद्र नाथ टैगोर और विद्यासागर जैसे लोग हाल की सदियों में हुए. लेकिन हिंदी पट्टी से कोई नहीं! शायद अभी तक सीता द्वारा दिए अभिशाप कि यह धरती कभी अपने बेटे के लिये खड़ी नहीं हो सकती, से मुक्ति नहीं मिली है, या भगवान बुद्ध द्वारा पूर्वानुमान कि अंतर्कलह हमेशा यहाँ कि समस्या रहेगी, अभी भी प्रभावी है!
भगवान हमें एक भगवान बुद्ध, एक मौर्या से नवाज़े.
भगवान हमें एक भगवान बुद्ध, एक मौर्या से नवाज़े.
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