साईबेरिया के ठंढे प्रदेश में अदालत अपने देश के संस्था को चौबीस घंटे का समय देती है यह तय करने के लिये कि चार हज़ार साल पुरानी दैवीय वाणी को आतंकवादी घोषित किया जाय या नहीं . . . यहाँ हमारे देश भारत में हमारे न्यायालय और अधिकारी सैंतीस सालों बाद भी यह फैसला नहीं कर पाते हैं कि इंसान का खून हुआ था या कि वह एक दुर्घटना में मारा गया था . . .
Tuesday, December 20, 2011
Monday, December 19, 2011
क्या गीता आतंकवादी साहित्य हो सकती है?
गीता के किसी अनुवाद पर चाहे वो कैसा भी अनुवाद . . . कितना भी बुरा अनुवाद हो . . . आतंकवाद/ अतिवाद/ गैर सामाजिक गतिविधि को समर्थन/ प्रश्रय देने के साहित्य के आरोप का खतरा हर भारतीये के लिये एक सदमा है (भारतीय में हिंदू/ ईसाई/ मुसलमान सभी शामिल हैं).
हिंदू (सनातन, जैन, बौद्ध, सिख, तथा अन्य कई जो इस धरती पर पनपी और जिस सब में मानव के स्वतंत्र और निर्विघ्न वैचारिक प्रवाह और उस प्रवाह का सर्वोच्च महत्त्व, सबसे महत्वपूर्ण समानता है) धर्म, पिछले ढाई हज़ार सालों से अधिनायकवादी विचारों के अनुयाईयों के आघात को झेलता रहा है. जब हम सुरक्षित होते हैं (मसलन जब हमें जजिया कर नहीं देना होता है), स्वतंत्र होते हैं, आत्म निर्भर होते हैं, तो हमारे विचारों के सामने कोई टिक नहीं सकता . . . यह बार बार . . . हर बार प्रमाणित हुआ है . . . उसका प्रमाण आज भी दुनिया के हर देश में है . . . तब भी हुआ था जब शिकागो में अठारह सितम्बर अठारह सौ तिरानवे को जिह्वा की ज्वाला ने सभागार को लील लिया था . . . लेकिन जब हमारे सिरमौर का सर कलम हो चुका हो . . . जब हम रोजी रोटी की तलाश में दूसरों के सामने हों . . . ऐसे लोगों के सामने जो यह कहते हों की सिर्फ उनके सर्वशक्तिमान के द्वारा भेजा हुआ दूत (भूत) सच बोलता था . . . और जो उस सच को नहीं दुहरायेगा वह पापी है . . . जो उस सच को नहीं मानेगा वह नरक जाएगा . . . उसे सजा मिलेगी . . . और उस सज़ा के इन्तेज़ार में वो “आखीरी दिन” का इन्तेज़ार कर रहे हैं . . . तो हिंदू धर्म की मजबूती हीं कमजोरी हो जाती है . . . एक अधिनायकवादी विचार का अभाव . . .
“सभी मुझी से जन्म लेते हैं” . . . सभी मुझी में समा जाते हैं” . . . “मैं हीं सारे सजीव और निर्जीव प्राणी को नियंत्रित करता हूँ” . . . ऐसा स्पष्ट संवाद गीता के पहले हिंदू साहित्य में कहीं नहीं है . . .
बहुत बार पौराणिक पुस्तकों को समझना बहुत मुश्किल होता है . . . यह बात भारतीय धार्मिक वक्ता अपने भाषण से पहले अक्सर बोळ देते हैं . . . नहीं भी बोलें तो भारतीय श्रोता यह जानते हैं की सामने वाले की कितनी बात अपनी जेब में भर कर घर ले जाना है . . . और यह समझदारी आज के युग में और भी जरूरी हो जाता है जब शासक से लेकर व्यापार तक हर चीज़ का अपने लाभकारी अंदाज़ में व्याख्या करवाने और प्रचारित करवाने में जुटा है . . . भारत की धरती के लोग जहाँ सर्वशक्तिमान इश्वर कई बार जन्म ले चुके हैं . . . लोगों को राह बतलाने के लिये . . . इन बातों को भली भाँती समझते हैं . . . लेकिन जब हममें से किसी का मुकाबला ऐसे प्राणी से हो जाए जो यह कहता हो की रात को जो उसके कमरे में भूत आया था सिर्फ वही सच बोलता है . . . तो फिर हमारे पास गीता सबसे अच्छी और बल प्रदान करने वाला साहित्य है जो कहता है की “सिर्फ मैं सत्य हूँ”
और हाँ यह तो कहना भूल हीं गया . . . हमारा सर्वशक्तिमान वो नहीं है जो गीता में बोलता है . . . हमारा देव गीता खुद है . . . गीता जी देव हैं . . . और कोई नहीं . . .
ISKCON उनलोगों की संस्था है जो ऐसे मनोवैज्ञानिक संघर्ष में शामिल हैं . . . आज की तारीख में वो हिंदू धर्म की अग्रणी पंक्ति है . . . यदी उनका कोई साहित्य किसी ऐसे को जो सभ्यता के प्रारंभ से भूत प्रेत के कहने पर मानवीय बौद्धिक क्षमता को तलवार का गुलाम बनाकर सर्वशक्तिमान को आकार देने की मानवीय कल्पना का भी तलवार से शमन का हामी हो . . . जिसे संसार के सभी मनुष्य की जेब बराबर पैसे हों या सभी को बराबर रूप से भिखारी बना दिया जाय . . . ऐसे विचारों की सनक का दौरा परता हो . . . ऐसे किसी को यदी गीता जी अतिवाद का जरिया लगता हो तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं है . . . क्यूंकि वे सदियों से अतिवादी हीं रहे हैं . . . और गीता जी में उनेंह अपने से दो कदम आगे का दर्शन हो रहा है . . . गीता जी अतिवादी नहीं हैं . . . यह उनके अंदर का अतिवादी है जो डर रहा है . . .
Sunday, November 27, 2011
पुलिस और मीडिया के नाम खुला पत्र
मैं उन्नीस से अधिक वर्षों से तमिलनाडु में रहता हूँ पिछले 21 वर्षों से देश में चारों ओर यात्राएं कर रहा हूँ. मुझे लगता है कि अपने दम पर रहने वाले किसी भी व्यक्ति को (बिना लाल बत्ती कि गाड़ी और आगे पीची कमांडो के) इस बात का अहसास होगा कि हमारे देश में सामाजिक ताने - बाने काफी कमजोर हैं. आज राज ठाकरे से लेकर शीला दीक्षित तक, लोग उत्तर भारतीयों / हिंदी वालों खास कर बिहारियों की गर्दन तलाशते रहते हैं. तमिलनाडु में हिंदी भाषी लोगों की हालत किसी से छिपी नहीं है. अकसर विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में छात्रों के बीच राज्यों के आधार पर झगड़े की मीडिया में रिपोर्ट आती रहती है.
आज टाइम्स ऑफ इंडिया, चेन्नई संस्करण में मुख पृष्ठ पर एक समाचार के शीर्षक का हिंदी अनुवाद है - "7 बिहारी छात्र आतंकी लिंक के लिए गिरफ्तार". मैं अंदर की कहानी के बारे में टिप्पणी नहीं करना चाहूँगा क्यूंकि मैं पुलिस या प्रेस को अपमानित नहीं होते देखना चाहता (गौर तलब है कि जिस व्यक्ति को वे गिरफ्तार करना चाहते थे वह भाग गया और वह दिल्ली से आया था!), लेकिन यह पूरी तरह (मुझे यकीन है कि पुलिस आम जनता को दी गयी जानकारी के मूल्य को समझते हैं) पुलिस और प्रेस द्वारा एक खराब प्रस्तुति और एक समयपूर्व प्रेस विज्ञप्ति है.
प्रस्तुति से, यह प्रतीत होता है कि पड़ोसियों ने परेशान होकर (बिहारी अपने अशिष्ट व्यवहार के लिए कुख्यात रहे हैं - एक बिहारी होने के कारण मैंने खुद अनुभव किया है) छात्रों खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है . . .
इसके अलावा, हम सब जानते हैं कि “बिहारी” कोई पहचान नहीं है, जैसे कोई धर्म या कबीले या जाति या भाषा नहीं है जिसे "बिहारी" कहा जाता है. ऐसी स्थिति में, ऐसे बदनाम खबर के लिए एक राज्य के नाम का उल्लेख सिर्फ लापरवाही है जो प्रेस में जिम्मवार पड़ पर आसीन व्यक्ति की अज्ञानता बतलाती है. यदि वे गिरफ्तार लोगों के नाम, पता छापते, तो बात और होती.
अतीत में मैंने “दो उत्तर भारतीयों ने यात्रा खराब की" जैसे शीर्षक में समाचार पढ़ा है जब दवा का उपयोग कर सहयात्रियों को लूटने की रिपोर्ट छापी थी (एक अन्य समाचार पत्र द्वारा), और मैं यह भी जानता है कि तमिलनाडु में ऐसी प्रस्तुति सड़क किनारे . . . चाय कि दुकानों पर . . . लोगों द्वारा पसंद की जाती है और चाव से चर्चा की जाती है और यह भी कि मेरी इस लेखन की वजह से बंद यह सब बंद नहीं होने वाला है क्यूंकि यह बिजनेस देता है. फिर भी आदतन, मैंने तमिलनाडु पुलिस (शिकायत संख्या: E11CHI609) तथा टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक को लिखा है और आप सबके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ.
Wednesday, November 2, 2011
इश्क की रंगीनियाँ
मज़ा तो बहुत है इश्क की रंगीनियों में,
बस जेब में दाम हो जाए
हर ज़र्रा धरकता है प्यार के खातिर
बस पहले प्यार हो जाए
विद्रोह कि फितरत भी अपना रंग दिखा देगी
पहले अपना काम हो जाए
इश्क में डूबने का जी करता है
पर पहले साहिल का इंतज़ाम हो जाए
इश्क की रंगीन चादर बहुत सुन्दर है
डर है कहीं ये दाग न हो जाए
Saturday, October 29, 2011
छठ
छठ और दिवाली भारतीय संस्कृति के सबसे पुराने त्यौहार में से है. छठ क्यूँ बिहार/ पूर्वी उत्तर प्रदेश में सिमट कर रह गया यह आज कि तारीख में सिर्फ अंदाज लगाया जा सकता है – मेरी अमझ से इसका कारण सदियों से हमारे देश की असुरक्षा हो – क्यूंकि इस पूजा का बड़ा हिस्सा घर से बाहर – जल श्रोत के किनारे होना होता है.
छठ इस संसार और जिंदगी के छः सबसे महत्वपूर्ण तत्वों – आग, जल, मिट्टी, वायु, अन्न तथा सूर्य कि अराधना है. कोई आश्चर्य नहीं यदि प्राचीन काल में यह पर्व दिवाली के अग्नि पूजा से शुरू होकर छठे दिन सूर्य पूजा पर समाप्त होती रही हो!
जो भी हो, छठ, जीवन के सबसे महत्वपूर्ण कारकों की अराधना का पर्व है. मैं अपनी ओर से सूर्य देव की शान शान में सर झुकाता हूँ और जगत कल्याण की कामना करता हूँ.
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